AGRA MATHURA ZONE: हाथरस धर्म, संस्कृति और मर्यादा की प्रतिमूर्ति भगवान श्रीराम की लीलाओं का मंचन करने वाला श्रीरामलीला महोत्सव सासनी के अयोध्या चौक में अत्यंत भव्यता और धार्मिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ। मानस कलामंच द्वारा आयोजित इस महोत्सव का समापन श्री राम और माता सीता के राजतिलक की अलौकिक लीला के साथ हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया। निर्देशक हरिगोपाल गुप्त के कुशल नेतृत्व में कलाकारों ने चौदह दिनों तक अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से दर्शकों को राम भक्ति के सागर में डुबोए रखा।
अंतिम चरण की लीलाएँ: रावण दहन और भरत मिलाप
महोत्सव के अंतिम दो दिनों की लीलाएँ विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र रहीं। शनिवार की रात्रि में रावण दहन का अत्यंत भव्य और जीवंत मंचन किया गया। बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक इस मंचन को देखने के लिए अयोध्या चौक में जनसैलाब उमड़ पड़ा। रावण के अहंकार और उसका अंत दर्शाती इस लीला ने दर्शकों को धर्म और कर्तव्य के पालन का गहरा संदेश दिया।
इसके ठीक बाद, भरत मिलाप की मार्मिक लीला का मंचन हुआ। चौदह वर्ष के लंबे वनवास के बाद जब श्रीराम अपने छोटे भाई भरत से मिले, तो दोनों भाइयों का प्रेम और त्याग देखकर हर आंख नम हो गई। भरत ने जिस प्रकार श्रीराम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर राजकाज चलाया, वह त्याग और निष्ठा की पराकाष्ठा थी। कलाकारों ने इस भावनात्मक दृश्य को इतने सजीव ढंग से प्रस्तुत किया कि पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
लीला के अगले क्रम में, चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत कर, रावण का संहार करके जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम माता सीता और लक्ष्मण सहित वापस अवधपुरी (अयोध्या) लौटे, तो संपूर्ण सासनी नगर में दिवाली जैसा उत्सव छा गया। यह क्षण सिर्फ एक नाटक का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के उस मूल विचार को दर्शाता है, जहाँ राजा का लौटना प्रजा के लिए सबसे बड़ा त्यौहार होता है।
वेद मंत्रोच्चार के बीच हुआ राज्याभिषेक महोत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम चरण श्री राम-सीता का राज्याभिषेक था। इस ऐतिहासिक क्षण को धार्मिक विधि-विधान के साथ संपन्न किया गया।

आचार्य पं. अशोक कुमार शर्मा, उपाचार्य पं. संजय उपाध्याय, और सह उपाचार्य पं. शैलेश शास्त्री प. तुषार शर्मा के नेतृत्व में पंडितों की टीम ने पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की। पवित्र वेदमंत्रों के उच्चारण के बीच, भगवान श्रीराम का विधिवत अभिषेक किया गया। मंत्रों की ध्वनि से पूरा वातावरण शुद्ध और पवित्र हो गया।

अभिषेक के उपरांत, प्रभु श्रीराम को ससम्मान राजगद्दी पर विराजमान किया गया। यह सौभाग्य महेश चन्द्र गुप्ता को प्राप्त हुआ, जिन्होंने स्वयं भगवान श्री राम का राजतिलक किया और पूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी आरती उतारी। राजतिलक की यह रस्म सिर्फ एक परंपरा नहीं थी, बल्कि यह धर्म की स्थापना और न्यायपूर्ण शासन के आरंभ का प्रतीक थी।
कमेटी और संरक्षकों का अथक प्रयासइस विशाल और सफल आयोजन के पीछे श्री मानस कलामंच की पूरी कमेटी और संरक्षकों का अथक परिश्रम और समर्पण रहा।
कमेटी के मंत्री डॉ. लोकेश शर्मा ने बताया कि रामलीला का मंचन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को मर्यादा, त्याग, और धर्म के सिद्धांतों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। संरक्षक प्रकाश चन्द्र शर्मा ने सभी कलाकारों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में निम्नलिखित प्रमुख सदस्यों की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही:
संरक्षक मंडल: प्रकाश चंद शर्मा, डॉ. योगेश शर्मा, लीलाधर शर्मा, विनोद कुमार जैन, जयप्रकाश माहेश्वरी।
कार्यकारी सदस्य: प्रदीप गुप्ता, अनिल गुप्ता कातिब, प्रशांत, रामनिवास शर्मा, विमल शर्मा, धीरू गांधी, सतीश चंद्र गुप्ता, सुनील कुमार, गोपाल वाष्र्णेय, वृजेश शर्मा, प्रमोद गर्ग, अरविंद कातिब। सभी सदस्यों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि पूरे महोत्सव के दौरान व्यवस्था बनी रहे और दर्शक शांतिपूर्ण तरीके से रामलीला का आनंद ले सकें।
संस्कृति और आस्था का संगमसासनी में आयोजित यह श्रीरामलीला महोत्सव केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का एक अद्भुत संगम बन गया। इसने न केवल धार्मिक भावनाओं को मजबूत किया, बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द और एकजुटता का भी संदेश दिया। आयोजन के सफल समापन पर, सभी कलाकारों, आचार्यों, और सहयोगियों को कमेटी द्वारा सम्मानित किया गया। राजतिलक के बाद हुए महाप्रसाद वितरण के साथ ही इस भव्य महोत्सव का विधिवत समापन हो गया।
सासनी के लोग अब अगले वर्ष के श्रीरामलीला महोत्सव का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
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